The Latest | India | [email protected]

56 subscriber(s)


K
20/06/2024 Kajal sah Development Views 277 Comments 0 Analytics Video Hindi DMCA Add Favorite Copy Link
शून्य से शिखर

किसी भी लक्ष्य तक पहुँचने का पहला कदम है.. कि हम अपना पूरा ध्यान लक्ष्य के स्टेप्स पर केंद्रित करे।शून्य से शिखर तक पहुँचने के लिए सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी ध्यान है। अब प्रश्न है कि ध्यान क्या है? ध्यान क्यों जरुरी है?ध्यान की शक्ति को कैसे बढ़ाया जा सकता है? मन बहुत चंचल है।मन अत्यंत गतिशील होता है। मन को अपने वश में नियंत्रित करना ही ध्यान है। किसी महान इंसान सटीक कहा है - अपने मन पर जो विजय हासिल कर लेता है.. वही वास्तविक विजेता है। मन को नियमित अभ्यास के माध्यम से हम अपने वश में केंद्रित कर सकते है। ध्यान क्या है? ध्यान जिससे english में attention कहा जाता है। ध्यान एक मानसिक प्रक्रिया है। मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार की वस्तुएं देखता है, उनके विषय में कुछ सुनता है। उनमें से कुछ की ओर आकर्षित होता है और कुछ की तरफ वह ध्यान नहीं देता है। उसकी चेतना में अनेक वस्तुएं हो सकती है, किन्तु रुचिकर लगने वाली किसी विशेष वस्तु पर अपनी चेतना को केंद्रित करता है। इस प्रकार को किसी वस्तु विशेष या विचार पर विशेष पर केंद्रित करना ही ध्यान है। उदाहरण के लिए अगर छात्र किसी कमरे में बैठकर पुस्तक पढ़ रहा है, तो उसे वहां की सब वस्तुओं की कुछ - न - कुछ चेतना अवश्य होती है। परन्तु उसकी चेतना का केंद्र पुस्तक है, जिसे वह पढ़ रहा है। इससें हम अपने नकारात्मक विचारों, नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रित कर पाते है। ध्यान में अपार शक्ति, अपार उमंग और अपार उन्नति है। चलिए जानते है.. कि हम एकाग्रता अर्थात ध्यान की शक्ति को कैसे बढ़ाये? कुछ महत्वपूर्ण उपाय को आप अपने जीवन में आत्मसात कर सकते है। 1. नियमित : एटॉमिक हैबिट्स एक बेहद ही प्रसिद्ध किताब है। जिसमें लेखक कहते है कि किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए निरंतता अनिवार्य है। वर्तमान में हर एक चीज़ लोगों को शीघ्रता से मिल जाने के कारण ( जैसे - जल्दी कंटेंट इत्यादि ) अत्यधिक लोग सफलता अर्थात अपने लक्ष्य को भी शीघ्रता से पाना चाहते है। शीघ्रता से हासिल करना गलत नहीं है.. लेकिन जब शीघ्रता पाने का रास्ता गलत चुना जाता है। तब यह गलत है। लक्ष्य तक पहुँचने के लिए नियमित परिश्रम, अभ्यास और सकारात्मक सोच अनिवार्य है। ठीक उसी प्रकार तन, मन और आत्मा को संतुष्ट बनाने के लिए नियमित ध्यान जरुरी है। ध्यान आत्म - अनुशासन का प्रयास है, जो नियमित अभ्यास एवं प्रयास से विकसित किया जा सकता है। एकाग्रता की शक्ति के विकास लिए प्रतिदिन समय निकाल कर मैडिटेशन करे, विभिन्न योग करे। जिससे आप स्वस्थ, संतुलित एवं समृद्ध जीवन जी पाएंगे। 2. शांत : हम सभी के जीवन का उद्देश्य है - शांत एवं उत्साहपूर्ण जीवन। इस स्वप्न को पूर्ण करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका है कि आप ध्यान। जब हम अपने इन्द्रियों को नियमित रूप से नियंत्रित करते है। तब हम एक मजबूत एवं दृढ़ संकल्पी बन पाते है। सही वातावरण का प्रभाव जीवन पर बहुत पड़ता है। सही वातावरण अर्थात सकारात्मक, ऊर्जापूर्ण एवं उल्लासपूर्ण वातावरण के चयन से हम अच्छे से ध्यान केंद्रित के पाते है । एक शक्तिशाली प्रयोग है, जानबूझकर नकारात्मक विचारों के स्थान पर सकारात्मक विचारों को आत्मसात करना। उदाहरणस्वरूप, यदि आपको क्रोध आये, तो सचेत रूप से अपना ध्यान प्रेम और धैर्य के विचारों पर केंद्रित करें। यह जरूरी नहीं है कि जिस व्यक्ति या परिस्थिति के कारण नकारात्मक भावना उत्पन्न हुई हों, आप सकारात्मक विचारों को उनके प्रति ही केंद्रित करें। इस दृष्टिकोण का लगातार अभ्यास करने से मन की सकारात्मक स्थिति विकसित होती है, अधिकांश लोग नकारात्मक परिस्थितियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो उनके नियंत्रण में नहीं होती है। इसलिए वे जो कुछ बदलने की क्षमता रखते हैं, जैसे अपनी भावनाएं, विश्वास एवं व्यवहार, उनको बदलने में विफल रहते हैं। वह दोष रोपण का खेल खेलने अनुत्पादक आदत विकसित कर लेते है और अपने मूड को बेहतर बनाने के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी की उपेक्षा करते हैं। यदि हम खुश रहना चाहते हैं, तो हमें ऐसे नकारात्मक मानसिकता को नष्ट करना होगा। वास्तव में, बाहरी स्थिति से परे हम अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया चुनने के लिए स्वतंत्र होते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए की बाहरी परिस्थितियों और हमारे मन के बीच अंतर होता है। बाहरी दुनिया हमारे नियंत्रण में नहीं होती है, परंतु हमारी आंतरिक दुनिया हमारे नियंत्रण में है। इसे याद रखने से हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने की शक्ति मिलती है। भगवत गीता हमें अपने मन की शक्ति का प्रयोग कर, अपने उत्थान करने की शिक्षा देती न कि इस मन द्वारा स्वयं को नीचे गिरा ने की। अपनी स्वतंत्रता अनुसार, अपने दृष्टिकोण और भावनाओं को चुनने की क्षमता हमारे विकास की नींव है। इसलिए हमें अपने मन को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर उसका अभ्यास करना चाहिए। बाहरी परिस्थितियों में खुशी की तलाश हमें बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर बनाती है। इसके बजाय यदि हम यह मान ले कि प्रसन्नता हमारे विचारों और विश्वास में निहित एक आंतरिक संसाधन है, तो हम आनंद की निरंतर स्थिति बनाए रख सकते हैं। - स्वामी मुकुंदानंद

Related articles

 WhatsApp no. else use your mail id to get the otp...!    Please tick to get otp in your mail id...!
 





© mutebreak.com | All Rights Reserved