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08/05/2024 Kajal sah Awareness Views 194 Comments 0 Analytics Video Hindi DMCA Add Favorite Copy Link
कविता : जागरण गीत
कविता : जागरण गीत 
अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे 
गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूँ 
अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूंगा 
अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ।

कल्पना में आज तक उड़ते रहे तुम 
साधना से सिहकर मुड़ते रहे तुम 
अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूंगा 
आज धरती पर बसाने आ रहा हूँ,

सुख नहीं यह, नींद  में सपने सँजाना,
दुख नहीं यह, शीश पर गुरु भार ढोना।
शूल तुम जिसको समझते थे अभी तक 
फूल मैं उसको बनाने आ रहा हूँ।

देखकर मँझधार को घबरा न जाना 
हाथ ले पतवार को घबरा न जाना।
मैं किनारे पर तुम्हें थकने न दूंगा 
पार मैं तुमको लगाने आ रहा हूँ।

तोड़ दो मन में कसी सब श्रृंखलाएँ,
तोड़ दो मन में बसी संकीर्णताएँ।
बिंदु बनकर मैं तुम्हें ढलने न दूंगा 
सिंधु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ।

तुम उठो, धरती उठे, नभ शिर उठाए 
तुम चलो गति में नई गति झनझनाए 
विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूंगा 
प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूँ।

धन्यवाद 
कवि - सोहनलाल द्विवेदी।
                             

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