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01/09/2021 Prakash Rana General Views 92 Comments 2 Analytics English DMCA Add Favorite
इंसान या राक्षस
मैने बचपन मे बहुत सी डरावनी कहानियां सुनी है, जिनमे भूत, पिशाच, चुड़ैल, डायन इन सब का ज़िक्र होता था, कुछ कहानियां दोस्त सुनते थे, कुछ भैया, तो कुछ मेरे घर के बड़े बुजुर्ग, जिसमे से ज्यादातर मेरी दादी सुनाती क्योंकि मैं उनके साथ  ही रहा करता था, सभी कहते कि ये सारी कहानियां सच्ची है, क्योंकि ये सब उन्होंने अपनी आंखों से देखा है, मैं इन सारी कहानियों से डर जाता था, इन कहानियों का खौफ मेरे जेहन में घर कर चुका था, मैं चाह कर भी उन्हें भुला नही पा रहा था, तब मेरी दादी ने कहा हमारे गांव के जो राजा है भगवान जी, तुम उनकी पूजा करो वो तुम्हे इन सब से बचाएंगे, इसी वजह से मैने कई मंत्र याद कर लिए थे, ताकि मैं इनसे हमेशा बचा रहूं और भगवान जी हमेशा मेरी रक्षा भी करते थे, जब कभी मैं डर जाता तो उनके मंत्रो का जाप करता, उसके बाद मेरा डर कहाँ चला जाता पता ही नही चलता, इस वजह से मैं काफी सुकून से अपना जीवन व्यतीत करने लगा था, 

दादी कहती जो भगवान की पूजा नही करते है उनके साथ हमेशा बुरा होता है, उसमें राक्षसों का साया आ जाता है, इसी वजह से हमारे गांव मे सभी भगवान की पूजा करते थे, लोग जितना भूतों से नही डरते थे उससे ज्यादा, भगवान के नाराज़ हो जाने से डरते थे, कोई उन्हें कभी नाराज़ नही करता सभी उनकी अच्छे से पूजा करते थे, हमारे गांव में एक सुरंग थी, मेरी दादी बताती थी कि उस सुरंग में भूत, पिशाच, डायन जैसी नकारात्मक शक्तियों का बसेरा है, हर इंसान वहां जाने से डरता है, लेकिन कुछ जिज्ञासु लोग भी थे जिन्हें भूतों को अपनी आंखों से देखने की ललक थी वो वहां जाने की हमेशा सोचते, लेकिन वहां कोई भी अपनी मर्ज़ी से नही जा सकता था, भगवान जी तय करते है, कौन कब उस सुरंग में जायेगा, लेकिन हर किसी को एक ना एक बार उस सुरंग में जाना ही पड़ता था, क्योंकि भगवान जी जीवन मे एक बार सबकी परीक्षा लेते थे, वो देखना चाहते थे कि कौन उनमें कितनी आस्था रखता है, जो सबसे ज्यादा आस्था रखते, वो उन्हें अपने पास बुला लेते, और जो उनमें आस्था नही रखते उन्हें ऐसे ही दुख भरा जीवन जीना पड़ता, 

भगवान जी किसी को 18 साल की उम्र में भेजते, तो किसी को 10 साल की उम्र में, तो किसी किसी को तो पैदा होते साथ ही उस सुरंग में जाना पड़ता, इसके लिए कोई तय उम्र सीमा नही थी, मेरी दादी को भी जाना पड़ा था, मेरे घर मे सभी बड़े उस सुरंग से जाकर आ चुके थे, मेरी दादी मुझे हमेशा से ही अच्छी लगती थी, पर कभी कभी वो गुस्सा भी कर देती थी, कभी कभी उनके मन मे लोभ भी जगह पा लेता था, लेकिन जो भी हो उन्होंने मुझसे बहुत प्यार किया, दादी कहती कि तुम्हे भी एक दिन जाना पड़ेगा, जो उनकी पूजा तन मन धन से उनकी पूजा करता था वो पहले से भी बेहतर इंसान बनकर बाहर आता, उसमें भगवान जी के जैसे गुणों का विकास हो जाता है, उसके पास धन संपत्ति और सुकून की कभी कमी नही होती, वो अपने साथ साथ हर किसी के बारे में सोचता, हर किसी की मदद करता, हर किसी को क्षमा कर देता है, और जो भगवान जी की पूजा नही करते थे या कम करते थे वे लोग एक राक्षस बन कर बाहर आते, उसमें क्रोध, लोभ, घृणा जैसे कई गुणों का विकास हो जाता, वो पहले की तरह इंसान नही रहते, वो राक्षस बन जाते थे, इसीलिए भगवान की बहुत पूजा करता हर समय उनका जाप करता, क्योंकि मुझे राक्षस नही बनना था, एक अच्छा इंसान बनना था, 

मुझे याद नही है मेरी उम्र क्या थी जब में मुझे उस सुरंग में भेजा गया, लेकिन मैंने सुरंग में जाने से पहले से लेकर सुरंग से बाहर निकलने तक कभी भी भगवान का ध्यान करना नही छोड़ा, हर पल उनको याद किया हर समय उनके मंत्रो का उच्चारण करता रहा हूँ, लेकिन इन सब के बावजूद मुझमे कुछ बदलाव तो ज़रूर आये है, अब मुझे ये नही मालूम कि ये बदलाव इंसान वाले थे या राक्षस वाले, जब मैंने उस सुरंग में कदम रखा तब मुझे कुछ अलग नही लगा, क्योंकि वहां भी सब कुछ यहां के जैसा ही था काफी सारे लोग थे, मुझे समझ ही नही आता कि कौन अच्छा है और कौन बुरा क्योंकि सभी दिखने में एक समान थे, और सभी मेरे दोस्त होने का दावा करते थे, लेकिन सच तो ये था कि उसमें कुछ ही दोस्त होते बाकी दोस्ती का चेहरा ओढ़े हुए धोखेबाज होते, उनको पहचान पाना बहुत मुश्किल होता था, कुछ लोग कहते ये दुनिया बहुत बुरी है तुम्हे इसमें ज़िंदा रहना है तो लड़ना सीखना होगा, खुद को बचाने के लिए कुछ गलत भी करना पड़े तो उसमें कुछ गलत नही है, क्योंकि दुनिया मे ऐसे लोग भी थे जो मुह से निवाला छिनने में लगे हुए है, कुछ लोग कुछ पल के सुकून के लिए किसी की दुनिया उजाड़ने तक से कतराते नही थे, उन्हें यही सब कर के सुकून मिलता था, इन लोगो को मैं खलनायक कहता था, 

लेकिन कुछ लोग अच्छे भी थे, जो सबका भला करते, सबकी मदद करते, जिनको एक वक्त का खाना नसीब नही हुआ उन्हें अपना खाना तक दे देते थे, जो किसी की उजड़ चुकी दुनिया को अपने खून से सींच कर उसे वापस हरा भरा करते थे, इतनी सारी यातनाओं के बावजूद वो हमेशा अच्छे ही रहे उनमें कभी कोई बदलाव नही आया, ऐसे लोगो को मैं नायक कहता था, 

मैं इन दोनों तरह के लोगो साथ ही उस सुरंग में था, पहले मैं कमज़ोर था लोग यातनाएं देते, मेरा मज़ाक बनाते, मुझे हीन महसूस करवाते, मेरा तिरस्कार करते, फिर कुछ लोगो ने मुझे लड़ना सिखाया धीरे धीरे में ताकतवर होता गया, अब किसी मे हिम्मत नही थी कि मुझे यातना दे सके, तिरस्कार करे या मज़ाक उड़ाए, मैंने खुद के लिए लड़ना सीख लिया था, अब मैं अच्छे के साथ अच्छे और बुरे के साथ बुरा हो जाता था, जिसकी वजह से मुझमे काफी बदलाव आ गए मैं पहले की तरह नही रहा, कभी कभी मैं बहुत अच्छा होता तो कभी कभी बहुत बुरा, लेकिन मैंने कभी भगवान का साथ नही छोड़ा सदैव उनकी पूजा की, कभी वो साथ देते तो कभी नही, लेकिन मैंने कभी उनका साथ नही छोड़ा, लोग कहते है कि मैं उस सुरंग से वापस आ कर बदल गया हूँ, मैं वो नही रहा जो पहले हुआ करता था और मैं इस बात को झुठला नही सकता क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझमे काफी बदलाव हो गए है, कभी मुझे ये बदलाव मुझे सकारात्मक लगते तो कभी नकारात्मक, कुछ लोग कहते मुझमे राक्षस जैसे गुणों का विकास हो गया है, मैं क्रोध करने लगा हूँ, मुझमे लोभ आ गया, तो कुछ लोग कहते कि तुममें भगवान जैसे गुणों का विकास हो गया है, तुम पहले से ज्यादा बेहतर इंसान बन गये हो तुम सबकी मदद करते है, तुम सबको माफ कर देते हो, कुछ दिन में तुम्हारे पास भी धन संपत्ति सब कुछ होगा तुम सबकी पहले से ज्यादा अच्छे से लोगों की मदद कर पाओगे, 
अब मुझे समझ नही आ रहा है कि इनमें से कौन सच बोल रहा है, इसी वजह से मैं असमंजस की स्थिति में आ गया हूँ, इन दोनों की वजह से मैं खुद से सवाल करने लगा हूँ, जिसके जवाब मुझे लाख कोशिशों के बावजूद नही मिल रहे है मैं आज भी खुद को समझने की जद्दोजहद में लगा हुआ हूँ कि मैं कौन हूँ, इंसान या राक्षस..

© Dev Prakash
                             
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01.09.2021 Prakash Rana

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